प्रकाश पुंज
प्रभा जैन
तिमिर की रात्री का तम
गहराया हुआ
चहुंऔर विदिर्ण हो रहा।
विशाल नभ को
छूते ये व्रक्ष की शाखायें
किसी काल की भांती
प्रदीप्त हो रहा।
हर कोने से गहराती
काली परछायी का
शोर हो रहा।
निस्तेज सा जीवन
बेखबर अंधियारे से
निर्व्रघ्न सो रहा।
मन भेार की भांति
अरूणिम आभा में
प्रकाश पुंज बन
कोइ सपने संजो रहा।
क्यूं सहसा::::
सपने अठखेली करती
प्रसूनों की पंखुडियां
धूप में खिलने को बैचेन
कि सहसा****
मौत का काफिला
गुजरा जो उधर से
घर के कोने कोने में
सपनों की होली जल रही
प्रकाशपुंज को प्रभा
फिर भी तरस रही।
16(311 शास्त्री नगर
खटोदरा कालोनी
सूरत-2 मो-9723544153

parmaatmaa kare aap ko adhik nahee tarasnaa pade ,naye blog ke liye shubhkaanaayein
ReplyDeletewaah............shubh kamnaayen
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